Home desh अयोध्या राम जन्मभूमि मामले को जरिए बातचीत से सुलझाने के लिए भेजा जाए या नहीं आज होगा फैसला

अयोध्या राम जन्मभूमि मामले को जरिए बातचीत से सुलझाने के लिए भेजा जाए या नहीं आज होगा फैसला

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नई दिल्ली। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा या नहीं इसका फैसला आज चीफ जस्टिस रंजन गोगई, न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की संविधान पीठ शुक्रवार को देगी कि इस मसले का हल आपसी समझौते से निकाला जाना चाहिए या नहीं?

निर्मोही अखाड़े को छोड़ सभी खिलाफ-
इस मामले में निर्मोही अखाड़े को छोड़ लगभग सभी हिन्दू पक्षकार और उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले में मध्यस्थता के खिलाफ हैं। रामलला विराजमान का कहना है कि यह मामला राम जन्मभूमि से संबंधित है लिहाजा आस्था और विश्वास के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। वहीं निमोही अखाड़ा और मुस्लिम पक्षकार का कहना है कि वह इस मामले में मध्यस्थता के लिए तैयार है। आज देखने वाली बात होगी कि संविधान पीठ इस मसले पर क्या फैसला सुनाती है।

Ayodhya Ram Janmabhoomi case should be sent to resolve the issue or not today will decide

निर्मोही अखाड़ा जैसे हिंदू संगठनों ने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों – न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ, न्यायमूर्ति ए के पटनायक और न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी के नाम मध्यस्थ के तौर पर सुझाए जबकि स्वामी चक्रपाणी धड़े के हिंदू महासभा ने पूर्व प्रधान न्यायाधीशों – न्यायमूर्ति जे एस खेहर और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए के पटनायक का नाम प्रस्तावित किया। वहीं न्यायालय ने बुधवार को सुनवाई करते हुए कहा था कि वह अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को मध्यस्थता के लिये भेजा जाए या नहीं इस पर आदेश देगा। साथ ही इस बात को रेखांकित किया कि मुगल शासक बाबर ने जो किया उस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं और उसका सरोकार सिर्फ मौजूदा स्थिति को सुलझाने से है।शीर्ष अदालत का मानना है कि मामला मूल रूप से जमीन से संबंधित नहीं होकर धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है।

पहले दिया था सुझाव-
इससे पहले, फरवरी महीने में शीर्ष अदालत ने सभी पक्षकारों को दशकों पुराने इस विवाद को मैत्रीपूर्ण तरीके से मध्यस्थता के जरिये निपटाने की संभावना तलाशने का सुझाव दिया था। न्यायालय ने कहा था कि इससे ‘‘संबंधों को बेहतर’’बनाने में मदद मिल सकती है। शीर्ष अदालत में अयोध्या प्रकरण में चार दीवानी मुकदमों में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले के खिलाफ 14 अपील लंबित हैं। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या में 2.77 एकड़ की विवादित भूमि तीनों पक्षकारों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर बांट दी जाये।

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सुनवाई के दौरान रामलला की ओर से मामला मध्यस्थता को भेजे जाने का विरोध किया गया है। मध्यस्थता के लिए कोई नाम भी नहीं दिया है। इसके अलावा निर्मोही अखाड़ा को छोड़कर सभी हिन्दू पक्षकारों ने भी मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का विरोध किया है जबकि सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड सहित सभी मुस्लिम पक्षकार मध्यस्थता के लिए राजी हैं। आज देखने वाली बात यह होगी कि सुपी्रम कोर्ट अपना क्या फैसला सुनाती है।

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